Thursday, 2 February 2017

सुभाषितम्

१)
अप्यब्धिपानान्महत: सुमेरून्मूलनादपि |
अपि वहन्यशनात् साधो विषमश्चित्तनिग्रह: │

अर्थात- अपने स्वयं के मन का स्वामी होना यह संपूर्ण सागर के जल को पिना, मेरू पर्वत को उखाडना या फिर अग्नी को खाना ऐसे असंभव बातों से भी कठिन है।


२)
न अहं जानामि केयुरे, 
नाहं जानामि कुण्डले |
नूपुरे तु अभिजानामि
नित्यं पादाभिवन्दनात् ||

अर्थ-
रावण जब बलपुर्वक सीता माता को ले जा रहा था तभी सीता माता ने अपने कुछ आभूषण इस आशा से गिराए थे की श्रीराम उन्हे देखकर उन तक पहुंच सके।

यही आभूषण लक्ष्मण को श्रीराम ने पहचान ने के लिए कहा।
तब लक्ष्मण ने कहा “ मैं इन कुण्डलों तथा बाजूबंद को तो नही पहचान सकता।
परन्तु नित्य उनके चरण स्पर्श करते रहने कारण यह नुपूर उनके ही है यह मैं निश्चयसे कह सकता हूं"।

३)
उपाध्यात् दश आचार्य: आचार्याणां शतं पिता |
सहस्रं तु पितृन् माता गौरवेण अतिरिच्यते ||

अर्थ-- आचार्य उपाध्याय से दस गुना श्रेष्ठ होते है |
पिता सौ आचार्याें के समान होते है |
माता, पिता से हजार गुना श्रेष्ठ होती है |

४)
भीष्मद्रोणतटा जयद्रथजला गान्धारनीलोत्पला |
शल्यग्राहवती कॄपेण महता कर्णेन वेलाकुला //

अश्वत्थामविकर्णघोरमकरा दुर्योधनावर्तिनी |
सोत्तीर्णा खलु पाण्डवै: रणनदी कैवर्तक: केशव: //


भीष्म और द्रोण जिसके दो तट है जयद्रथ जिसका जल है शकुनि ही जिसमें नीलकमल है ,शल्य जलचर ग्राह है कर्ण तथा कॄपाचार्य ने जिसकी मर्यादा को आकुल कर डाला है ,अश्वत्थामा और विकर्ण जिस के घोर मगर है ,ऐसी भयंकर और दुर्योधन रूपी भंवर से युक्त रणनदी को केवल श्रीकृष्ण रूपी नाविक की सहायता से पाण्डव पार कर गये |

५)
क्रोधो मूलमनर्थानां  क्रोधः संसारबन्धनम्।
धर्मक्षयकरः क्रोधः तस्मात् क्रोधं विवर्जयेत्॥

 क्रोध समस्त विपत्तियों का मूल कारण है, क्रोध संसार बंधन का कारण है, क्रोध धर्म का नाश करने वाला है,  इसलिए क्रोध को त्याग दें।

Anger is the root cause of all misfortunes.Anger is the reason for bondage with this world. Anger reduces righteousness, hence give up anger.

६)
संसारकटुवृक्षस्य द्वे फले अमृतोपमे।
सुभाषितरसास्वादः सङ्गतिः सुजने जने।।

भावार्थ : संसार रूपी कड़ुवे पेड़ से अमृत तुल्य दो ही फल उपलब्ध हो सकते हैं, एक है मीठे बोलों का रसास्वादन और दूसरा है सज्जनों की संगति। यह संसार कष्टों का भंडार है, पग-पग पर निराशाप्रद स्थितियों का सामना करना पड़ता है। ऐसे संसार में दूसरों से कुछ एक मधुर बोल सुनने को मिल जाएं और सद्व्यवहार के धनी लोगों का सान्निध्य मिल जाए तो आदमी को तसल्ली हो जाती है। मीठे बोल और सद्व्यवहार की कोई कीमत नहीं होती है, परंतु ये अन्य लोगों को अपने कष्ट भूलने में मदद करती हैं। कष्टमय संसार में इतना ही बहुत है।

७)
 #ऋग्वेद की सूक्तियाँ :-

"तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति।
सूरयः दिवीव चक्षुराततम्"।।

अर्थ-
विद्वान लोग गगन में निबद्ध दृष्टि के समान विष्णु के उस परम पद को सदैव देखते रहते हैं।


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